Em Andamento

तिलक का महत्व

हमारे शास्त्रों में तिलक को प्रत्येक धार्मिक कृत्य में अनिवार्य माना गया है क्योंकि बिना तिलक धारण हमारे द्वारा ग्रहण, संक्रान्ति, अमवास्यादि पर्व पर किये गये स्नान, दान, तप, यज्ञ, होम, देव पूजा, पितृ पूजा आदि सारे धार्मिक कर्म निष्फल हो जाते हैं ! धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं अपितु स्वाथ्य की दृष्टि से भी तिलक का विशेष महत्त्व है !

शास्त्रों में त्रिपुण्ड और ऊर्ध्वपुण्ड के महत्व पर विशेष चर्चा की गयी हैं ! त्रिपुंड के विषय में तो कहा गया है कि जप, तप, होम, यज्ञ, वैश्वदेव पूजन, देव पूजा, श्राद्ध पूजा के पावन अवसर पर जो विमलात्मा साधक त्रिपुण्ड धारण करता है वो मृत्यु को भी जीत सकता है अर्थात दीर्घजीवी होता है !

ऊर्ध्वपुण्ड तीर्थों की मिट्टी से और त्रिपुण्ड यज्ञ की भस्म से लगाना चाहिए या ऊर्ध्वपुण्ड और त्रिपुंड का तिलक चन्दन से धारण किया जा सकता है ! पतितपावनी तीर्थों की मिट्टी और चन्दन के अतिरिक्त कुंकुंम, सिन्दूर से भी तिलक लगाया जा सकता है, लेकिन तीर्थों की पवित्र व शुद्ध मिट्टी के तिलक को शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि तीर्थों की पावन मिट्टी में सभी प्रकार के संक्रामक कीटाणुओं को विनष्ट करने की अद्भुत शक्ति होती है !

हमारे शास्त्रों में, यज्ञ में जिस प्रकार की समिधा (आम, खदिर, गुल्लर, पीपल, पलाश,अपामार्ग आदि लकड़ियों ) या ( गिलोय, कमलगट्टा, जटामांसी, वच, अगर, तगर, चन्दन का बुरादा आदि ) सामग्री का प्रयोग किया जाता है, आयुर्वेद में इन से कई प्रकार की औषधियों का निर्माण भी होता है इसलिए यज्ञ की भस्म का तिलक भी स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है !

अगर तीर्थों की पावन मिट्टी, चन्दन, सिन्दूर, कुंकुंम, यज्ञ की भस्म उपलब्ध न हो तो गंगा जल से या शुद्ध जल से भी तिलक किया जा सकता !

ऊर्ध्वपुण्ड ऊर्ध्व गति अर्थात मोक्ष का प्रतीक है और त्रिपुण्ड मन, कर्म, वचन की पवित्रता का प्रतीक है !

तिलक का ललाट या मस्तक पर लगाने का यही कारण है की हमारा मस्तिष्क शान्त रहे , मस्तिष्क में उठने वाले विचार सकारात्मक हों, शुद्ध हों क्योंकि सकारात्मक विचारों, निर्णयों और कर्मों का परिणाम भी अपने लिए और समाज के लिए सकारात्मक होगा अर्थात हितकारी होगा !

मन्त्र जापक, मन्त्र साधक, योगी, सन्त, महापुरुष अपना ध्यान सुषुम्ना नाडी में अर्थात भृकुटी और ललाट के मध्य भाग में ही केन्द्रित करते हैं क्योंकि हृदय की सौ नाडीयों में सुषुम्ना नाडी विशेष महत्व रखती है क्योंकि सुषुम्ना नाडी हृदय से सीधे मस्तक के मध्य भाग से होते हुए ब्रह्मरन्ध्र से जुड़ती है ! हमारे मन में जितने भी संकल्प-विकल्प या विचार उठते हैं उसका प्रभाव सीधा हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है, इसीलिए जिस दिन मन दुखी होगा उस दिन शिर दर्द की सम्भावना अधिक रहती है ! जितना हमारा मन विकार रहित होगा उतना ही हमारा स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा ! स्वस्थ मन, स्वस्थ तन से ही स्वस्थ कर्म होगा जो हमारे लिए, समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है ! शुक्र (वीर्य) नामक धातु यों तो पूरे शरीर में है फिर भी मस्तक के साथ उसका गहरा सम्बन्ध है जिससे यौवन और बल सदा बना रहता है, इसी धातु की कमी के कारण मुख निस्तेज हो जाता है इसी धातु के कारण मुख पर सदा तेज बना रहता है, इसलिए भी यौवन की रक्षा, मुख मण्डल के तेज के लिए, वीर्य रक्षा के लिए अवश्य तिलक धारण करना चाहिए !

इसलिए हर रोज माथे पर तीर्थों की मिट्टी, चन्दन, सिन्दूर, कुंकुंम, यज्ञ की भस्म का तिलक अवश्य लगायें, स्वस्थ रहें !

आशा है आपको इस लेख से अवश्य लाभ मिलेगा ! लेख में किसी भी प्रकार की त्रुटि, कमी के लिए आप सभी नीर क्षीर विवेकी पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ ! आप सभी के अमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी ! सुझावों के लिए आप मेल भी कर सकते हैं -

ध्यान के लिए धन्यवाद, शीघ्र एक नए लेख के साथ आचार्य गर्ग , नमो नारायण, नमस्कार !

Habilidades: Blog

Ver mais:

Acerca do Empregador:
( 0 comentários ) India

ID do Projeto: #10489219

Premiar a:

mayurjain025

Hello sir I am working in seo and blog writing and posting.please provide this project

₹55555 INR em 30 dias
(0 Avaliações)
0.0